“काली अँधेरी रात थी फाल्गुन की पंचमी का चाँद भी डूब चुका था तब, मरना तो उसे था ही, सुना है कल रात पोस्टमॉर्टेम के लिए ले गये उसे। पास ही लेटी थी पत्नी और बच्चा भी था, बिखरी थी चाँदनी चारों ओर, और था प्रेम, और थी आशा, फिर भी ना जाने क्यों आया था नजर उसे एक भूत? खुल गई थी आँखें उसकी या फिर बरसों से सोय...”